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गृहस्वामिनी ही है घर की सही अधिकारिणी

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रात के सन्नाटे में कानों में सांय सांय की आवाज आने लगती है. मन में भय उत्पन्न होने लगा है. कहीं कोई अपना कोरोना की चपेट में तो नहीं ? फिर अपने आप ही सवाल का जबाव मिल जाता है नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता. वो तो घर में हैं सुरक्षित हैं. अभी कुछ दिनों से निंदिया रानी भी धोखा देने लगी है. पहले बिस्तर पर पहुंचते ही उनका आगमन हो जाता था पर अब शायद लाकडाऊन उसे भी निकलने में परेशानी होती होगी.

सूर्य की पहली किरण के साथ है घरों में बर्तनों की आवाज आने लगती है. गृहस्वामिनी को तो जल्दी उठना ही पड़ेगा लाकडाऊन और कोरोना से उसे क्या लेना देना आखिर परिवार जनों के चायनाश्ता फिर भोजन की व्यवस्था आखिर उसे ही तो करनी है. आम दिनों की अपेक्षा लाकडाऊन में बेचारी का काम और बढ़ गया है. पति बच्चे और अगर सास ससुर हैं तो वह सब घर में है तो खाने में सभी की पसंद के मुताबिक चीजें बनाना पड़ेगी.

वैसे सही भी है इस महामारी में हम लोग निठल्ले होकर घर में एक कोने से दूसरे कोने, बस घूम ही तो रहे है. साला समय है कि कटता ही नहीं. घर से बाहर दुकान में होता तो चंद ग्राहकों. को सामान देकर कुछ हंसी ठिठोली. भी हो जाती या आफिस में होते तो कुछ फायलें यहां से वहां या कुछ कम्प्यूटर वर्क में ही समय निकल जाता.

कोरोना और फिर लाकडाऊन दिन पर दिन अपनी रफ्तार को बढ़ा रहा है. आब तो ऐसा लगने लगा है पुराने दिनों को भूल ही जाना पड़ेगा. दोस्तों से मिलने में भी डर लगने लगा है. उनसे मुलाकात होती है पर जिस हर्षोल्लास से पहले मिल लिया करते थे वह खत्म. हो गया है अब सभी रिश्तों में औपचारिकता रहने लगी है.

अभी कुछ महीने तक चंद मुलाकात में ही दोस्ती हो जाया करती थी और चलती भी थी पर अब नहीं लगता कभी कोई नये दोस्तों के बारे में सोचेगा भी. आजकल तो फेसबुक मित्रों से भी खतरा होने वाली पोस्ट आने लगी है. वैसे एक तरह से ठीक भी है लोग अपने अपनों को छोड़कर बाहरी दुनिया में खोने लगे थे समय रहते उन्हें जीवन की सच्चाई समझ में आ गई और अपनों में अपनी खुशियां देखने लगे.

समय पर पहुंच गया बंदे
तू, अपने अपनों के पास
न जान कब तक रहता तू
अपने अपनों के लिये उदास

ऊषा वर्मन

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